Monday, August 3, 2009

का. सुभाष चक्रवती अमर रहे

पश्चिम बंगाल राज्य सेकेट्रीएट सदस्य, ट्रेड यूनियन नेता व वाममोर्चा सरकार में मंत्री कामरेड सुभाष चक्रवती की गणना बंगाल व देश के वामपंथी आंदोलन के उन लोकप्रिय नेताओ में होती है जिन्होंने अपना संपुर्ण जीवन पार्टी के लिए समर्पित कर दिया। आपकी मृत्यु से पार्टी व बंगाल के कामगार वर्ग के आंदोलन ने एक फायर ब्रांड नेता खो दिया है।

सुभाष चक्रवती ने अपना राजनैतिक जीवन छात्र आंदोलन के साथ शुरू किया। वे 1977 से 1979 तक एस एफ आई के राष्ट्रीय सचिव रहे। आप 1971 में माकपा की बंगाल राज्य कमेटी के सदस्य बने। अर्ध-फासीवादी दौर का का. चक्रवती ने न केवल जमकर मुकाबला किया वरन साथ ही छात्र राजनिती को भी संगठित किया। इसके पश्चात आपने ट्रेड युनियनो में भी काम किया व ताउम्र राज्य सीटू के सहसचिव रहे।

का. सुभाष चक्रवती की मृत्यु पर "न्यू इंडिया मुवमेंट" गहरा शोक व्यक्त करता है।

का. सुभाष चक्रवती अमर रहे।
का. सुभाष चक्रवती को लाल सलाम।

Tuesday, July 21, 2009

लोकतंत्र के चौथे खम्भे वालों की सम्पत्ति भी घोषित होनी चाहिये

सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों (कार्यपालिका) के लिए अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने का नियम बहुत पहले से ही लागू रहा है पर पिछले कुछ वर्षो के दौरान चुनाव लड़ रहे नेताओं (विधायिका) को अपना उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करते समय अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने के साथ उनके ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों की जानकारी देना भी अनिवार्य कर दिया गया था। गत दिनों केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रैस एसोसियेशन की ओर से आयोजित मुलाकात में कहा कि सरकार सौ दिनों के अन्दर न्यायाधीशों की ओर से सम्पत्तियों और देनदारियों की घोषणा से सम्बंधित एक विधेयक संसद में पेश करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में वे न्यायपालिका को पूरे विश्वास में लेकर ही यह कदम उठायेंगे, हम उनसे टकराव के रास्ते पर नहीं हैं। स्मरणीय है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायधीश सौमित्र सेन के खिलाफ दुराचरण के आरोप लगने के बाद ऐसे कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी। श्री मोइली का कहना था कि सरकार सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पूरी करवा कर जनता के बीच पनप रही यह धारणा समाप्त करेगी कि कुछ नहीं होता है। सौमित्र के खिलाफ लगे आरोपों की जॉच के लिए एक समिति का गठन किया गया है जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्यन्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर और प्रख्यात अधिवक्ता फाली एस नरीमन के साथ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीष बी. सुदर्शन रेड्डी को शामिल किया गया है।

ऐसा लगता है कि अब न्यायाधीशों को भी अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना ही पड़ेगी। पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सार्वजनिक रूप से यह मान कर कि तीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं, सारे ही जजों को कटघरे में खड़ा कर दिया था। देश के समस्त न्यायधीशों में से कौन तीस प्रतिशत में आता है और कौन सत्तर प्रतिशत में आता है, यह कहा नहीं जा सकता। यद्यपि यह भी सच है कि केवल सम्पत्ति की घोषणा भर कर देने से ना तो भ्रष्टाचार पर ही लगाम लगेगी और ना ही उनकी सही सम्पत्ति ही सामने आ पायेगी, किंतु अगर गलत सूचना देंगे तो भ्रष्ट जज एक गलती और करेंगे जो उन्हें कानून की गिरफ्त में लाने में मदद देगी। वैसे तो अधिकारियों और नेताओं की सम्पत्ति की घोषणा होने के बाद भी इनका भ्रष्टाचार कम नहीं हआ, अपितु दिन दूना रात चौगुना बढ ही रहा है। हॉ इतना अवश्य ही हुआ है कि इससे नेताओं में एक भय व्याप्त हुआ और उन्होंने जरूरी सावधानियॉ लेना प्रारंभ कर दिया।

दूसरी ओर जब लोकतंत्र के तीन स्तंभों द्वारा अर्जित सम्पत्ति को सार्वजनिक घोषणाओं के दायरे में लाया जा रहा है तो चौथे स्तंभ को ही क्यों मुक्त रखा जाये। पिछले दिनों प्रैस के बारे में जो सूचनाएं आयी हैं और जनसत्ता सहित अनेक वेव पत्रिकाओं ने इस विषय में जो कुछ भी छापा है उससे पता चलता है कि इस बहती गंगा में प्रैस के एक हिस्से के हाथ भी सूखे नहीं हैं। कोई समय था जब प्रैस में छपी खबर का कोई सम्मान था पर इसके व्यवसायीकरण के बाद इस संस्था का जो पतन हुआ है इससे इसे दलाल का दर्जा मिलता गया है। एक सेमिनार में तो मीडियाकर्मियों को 'मीडिया के मीडियेटर' कह कर याद किया गया था। मीडिया के जो संस्थान बकायदा कम्पनी अधिनियमों के अर्न्तगत रजिस्टर्ड हैं और आइ पी ओ लाकर बाजार से पूंजी एकत्रित करते हैं वे केवल एक उद्योग भर हैं! उनके पास समाज हितैशी कोई आदर्श होने का कोई सवाल ही नहीं है अपितु वे तो उसे लगायी गयी पूंजी की वापिसी और असीमित धन कमाने के साधन के रूप में ही देखेंगे! दरअसल वे प्रकाशन का उद्योग चला रहे हैं और उत्पाद का व्यापार कर रहे हैं। इसके लिए वे अखबार को किसी भी स्तर पर गिर कर बेचेंगे तथा जनता के बीच अपनी पहुच सकने की क्षमता की पूरी कीमत वसूलना चाहेंगे। यह कुछ ऐसा है जैसे किसी ने दवाइयों की दुकान में जूतों की दुकान खोल ली हो पर बोर्ड वही पुराना ही लगा रखा हो। जब मालिक चुनावों में पैकेज बेचेंगे तो पत्रकार भी अपने हाथ कैसे साफ रख सकते हैं क्योंकि मालिक तो शब्द जोड़ने और भाषा चित्र बनाने का काम करता नहीं है उसे तो वह काम पत्रकारों से ही कराना पड़ता है। भोपाल में जब एक पत्रकार ने अखबार मालिक से कम तनख्वाह के बारे में शिकायत की तो उसका कहना था कि तुम्हें इतना बड़ा बैनर तो दे दिया है, क्या अब भी तुम्हें ज्यादा वेतन की जरूरत है? बुन्देली में एक कहावत है- सौ के नब्बे कर दो, नाव दरोगा धर दो- अर्थात भले ही वेतन सौ की जगह नब्बे रूप्ये महीने कर दो पर पदनाम दरोगा का मिल जाये तो फिर पैसे तो बनाये ही जा सकते हैं। अच्छे बैनर के लिए लोग इसी कारण से लालायित रहने लगे हैं। अकेले भोपाल में ही ऐसे पचास से अधिक पत्रकार हैं जो आज से पच्चीस-तीस साल पहले साइकिल से चलते थे पर आज वे न केवल करोड़पति हैं अपितु उनके बंगलों में एकाधिक गाड़ियॉं हैं। अपने कर्तव्य के प्रति न्याय न करने के बदले में ही उन्होंने किसी न किसी संस्थान के पद हथिया लिये हैं व प्रमुख स्थलों पर स्थित लाखों रूप्यों की कीमत के सरकारी बंगले उनके अधिकार में हैं जिसका किराया भी वे ठीक से नहीं चुकाते पर कोई भी अधिकारी उनके खिलाफ चूं भी नहीं करता।

प्रैस मालिकों ने सरकार से प्रैस के नाम पर प्रमुख बाजार में प्लाट ले लिये हैं व अपने प्रभाव का स्तेमाल कर बैंकों से भरपूर ऋण ले उन पर बड़े बड़े भवन बना लिए हैं जिन्हें वे प्रैस से भिन्न कामों के कार्यालयों को किराये पर उठाये हुये हैं। प्रैस का दबाव बना कर वे भवन निर्माण आदि ऐसे अनेक तरह के व्यवसायों में लिप्त हैं जहॉ सरकारी हस्तक्षेप अधिक रहता है तथा अपने प्रभाव का स्तेमाल कर कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों को धमका कर स्थिति अपने पक्ष में करते रहते हैं। इससे भी वे अटूट काला धन पैदा कर रहे हैं।

कभी कमलेश्वर ने लिखा था कि प्रैस की स्वतंत्रता का मतलब प्रैस मालिकों की स्वतंत्रता नहीं होता अपितु पत्रकार की स्वतंत्रता होती है। प्रैस मालिकों ने प्रैस की सुविधाओं को अपनी व्यापारिक सुरक्षा में बदल लिया है व उनके पास समुचित मात्रा में दो नम्बर के पैसे एकत्रित होते जा रहे हैं इसलिए उनके लिए भी जजों की तरह सम्पत्ति की घोषणा को अनिवार्य किया जाना जरूरी हो गया है।

वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र. फोन ९४२५६७४६२९

Monday, June 8, 2009

गॉंव का नाम थियेटर मोर नाम हबीब

हबीब तनवीर नहीं रहे। वे उम्र के छियासीवें साल में भी नाटक कर रहे थे।अभी पिछले ही दिनो उन्होंने भारत भवन में अपना नाटक चरनदास चोर किया था तथा उसमें भूमिका की थी।

वे इतने विख्यात थे कि सामान्य ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति उनके बारे में सब कुछ जानता रहा है। कौन नहीं जानता कि उनका जन्म रायपुर में हुआ था और तारीख थी १९२३ के सितम्बर की पहली तारीख। उनके पिता हफीज मुहम्मद खान थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रायपुर के लॉरी मारिस हाई स्कूल में हुयी जहॉ से मैट्रिक पास करके आगे पढने के लिए नागपुर गये और १९४४ में इक्कीस वर्ष की उम्र में मेरिस कालेज नागपुर से उन्होंने बीए पास किया। बाद में एमए करने के लिए वे अलीगढ गये जहॉं से एमए का पहला साल पास करने के बाद पढाई छूट गयी। वे नाटक लिखते थे, निर्देशन करते थे, उन्होंने शायरी भी की और अभिनय भी किया। यह सबकुछ उन्होंने अपने प्रदेश और देश के स्तर पर ही नहीं किया अपितु अर्न्तराष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की। वे सम्मानों और पुरस्कारों के पीछे कभी नहीं दौड़े पर सम्मान उनके पास जाकर खुद को सम्मानित महसूस करते होंगे। १९६९ में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला तो १९७२ से १९७८ के दौरान वे देश के सर्वोच्च सदन राज्य सभा के लिए नामित रहे। १९८३ में पद्मश्री मिली, १९९६ में संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप मिली तो २००२ में पद्मभूषण मिला। १९८२ में एडनवर्ग में आयोजित अर्न्तराष्ट्रीय ड्रामा फेस्टीबल में उनके नाटक 'चरनदास चोर' को पहला पुरस्कार मिला।

वे नाटककार के रूप में इतने मशहूर हुये कि अब कम ही लोग जानते हैं कि पेशावर से आये हुये हफीज मुहम्मद खान के बेटे हबीब अहमद खान ने शुरू में शायरी भी की और अपना उपनाम 'तनवीर' रख लिया जिसका मतलब होता है रौशनी या चमक। बाद में उनके कामों की जिस चमक से दुनिया रौशन हुयी उससे पता चलता है कि उन्होंने अपना नाम सही चुना था। कम ही लोगों को पता होगा कि १९४५ में बम्बई में आल इन्डिया रेडियो में प्रोड्यूसर हो गये, पर उनके उस बम्बई जो तब मुम्बई नहीं हुयी थी, जाने के पीछे आल इन्डिया रेडियो की नौकरी नहीं थी अपितु उनका आकर्षण अभिनय का क्षेत्र था। पहले उन्होंने वहॉ फिल्मों में गीत लिखे और कुछ फिल्मों में अभिनय किया। इसी दौरान उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ आया और वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ कर इप्टा ( इन्डियन पीपुल्स थियेटर एशोसियेशन)के सक्रिय सदस्य बन गये, पर जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इप्टा के नेतृत्वकारी साथियों को जेल जाना पड़ा तो उनसे इप्टा का कार्यभार सम्हालने के लिए कहा गया। ये दिन ही आज के हबीब तनवीर को हबीब तनवीर बनाने के दिन थे। कह सकते हैं कि उनके जीवन की यह एक अगली पाठशाला थी।
१९५४ में वे फिल्मी नगरी को अलविदा कह के दिल्ली आ गये और कदेसिया जैदी के हिन्दुस्तानी थियेटर में काम किया। इस दौरान उन्होंने चिल्ड्रन थियेटर के लिए बहुत काम किया और अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात मोनिका मिश्रा से हुयी जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया। इस विवाह में ना तो पहले धर्म कभी बाधा बना और ना ही बाद में क्योंकि दोनों ही धर्म के नापाक बंधनों से मुक्त हो चुके थे। इसी दौरान उन्होंने गालिब की परंपरा के १८वीं सदी के कवि नजीर अकबराबादी के जीवन पर आधारित नाटक 'आगरा बाजार' का निर्माण किया जिसने बाद में पूरी दूनिया में धूम मचायी। नाटक में उन्होंने जामियामिलिया के छात्रों और ओखला के स्थानीय लोगों के सहयोग और उनके लोकजीवन को सीधे उतार दिया। दुनिया के इतिहास में यह पहला प्रयोग था जिसका मंच सबसे बड़ा था क्योंकि यह नाटक स्थानीय बाजार में मंचित हुआ। सच तो यह है कि इसीकी सफलता के बाद उन्होंने अपने नाटकों में छत्तीसगढ के लोककलाकारों के सहयोग से नाटक करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उनमें अपार सफलता मिली।

इस सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। १९५५ में जब वे कुल इकतीस साल के थे तब वे इंगलैंड गये जहॉं उन्होंने रायल एकेडमी आफ ड्रामटिक आर्ट में अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण दिया। १९५६ में उन्होंने यही काम ओल्ड विक थियेटर स्कूल के लिए यही काम किया। अगले दो साल उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा करके विभिन्न स्थानों पर चल रहे नाटकों की गतिविधियों का अध्ययन किया। वे बर्लिन में लगभग अठारह माह रहे जहॉं उन्हें बर्तोल ब्रेख्त के नाटकों को देखने का अवसर मिला जो बर्नेलियर एन्सेम्बले के निर्देषन में खेले जा रहे थे। इन नाटकों ने हबीब तनवीर को पका दिया और वे अद्वित्तीय बन गये। स्थानीय मुहावरों का नाटकों में प्रयोग करना उन्होंने यहीं से सीखा जिसने उन्हें स्थानीय कलाकारों और उनकी भाषा के मुहावरों के प्रयोग के प्रति जागृत किया। यही कारण है कि उनके नाटक जडों के नाटक की तरह पहचाने गये जो अपनी सरलता और अंदाज में, प्रदर्शन और तकनीक में, तथा मजबूत प्रयोगशीलता में अनूठे रहे।

वतन की वापिसी के बाद उन्होंने नाटकों के लिए टीम जुटायी और प्रदर्षन प्रारंभ किये। १९५८ में उन्होंने छत्तीसगढी में पहला नाटक 'मिट्ठी की गाड़ी' का निर्माण किया जो शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छिकटकम ' का अनुवाद था। इसकी व्यापक सफलता ने उनकी नाटक कम्पनी 'नया थियेटर' की नींव डाली और १९५९ में उन्होंने संयक्त मध्यप्रदेष की राजधानी भोपाल में इसकी स्थापना की। 1970 से 1973 के दौरान उन्होंने पूरी तरह से अपना ध्यान लोक पर केन्द्रित किया और छत्तीसगढ में पुराने नाटकों के साथ इतने प्रयोग किये कि नाटकों के बहुत सारे साधन और तौर तरीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर डाले। इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी के बारे में भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ के नाचा का प्रयोग करते हुये 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' की रचना की। बाद में श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।

हबीबजी प्रतिभाशाली थे, सक्षम थे, साहसी थे, प्रयोगधर्मी थे, क्रान्तिकारी थे। उनके 'चरणदास चोर' से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना' जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेकानेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना है। उन्होंने रिचर्ड एडिनबरो की फिल्म गांधी से लेकर दस से अधिक फिल्मों में काम किया है तो वहीं २००५ में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाकूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा 'गॉव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब'। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जायेगा।

वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन ९४२५६७४६२९

Sunday, May 31, 2009

जय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो
लूट मार के बाद सभी का अपना हिस्सा तय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

दल बदलू वोटों की जय हो
संसद में नोटों की जय हो

लोकतंत्र की इस चौपड़ में
अमरीकी गोटों की जय हो
सीनाजोरी करता फिरता हर दलाल निर्भय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

सच पर प्रतिबंधों की जय हो
जाचों के अन्धों की जय हो
लोकतंत्र के नाम चल रहे
सब काले धंधों की जय हो
मतलब तो सीधा सपाट पर पेंचदार आशय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

पंजों की कमलों की जय हो
कांटों के गमलों की जय हो
कन्याओं पर राम नाम की
सेना के हमलों की जय हो
गूंगी जनता बहरा शासन अंधा न्यायालय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

वीरेन्द्र जैन
/1 शलीमार स्टलिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629

Monday, April 20, 2009

का. अहिल्या ताई को लाल सलाम


वयोवृद्ध माकपा नेता, एडवा (अखिल भारतीय जनवादी महिला संगठन) की संस्थापक व मुंबई से माकपा की भूतपूर्व सांसद का। अहिल्या रांगणेकर का 19 अप्रैल को निधन हो गया, आप 87 वर्ष की थी।

आपका संपुर्ण जीवन महाराष्ट्र व देश में वामपंथी व महिला आंदोलन के प्रसार को समर्पित रहा। आप माकपा के महान नेता बी.टी.रणदिवे की बहन थी।

महिलाओ के लिये एक वर्गविहिन, प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष समाज के निर्माण के लिये आपके क्रांतिकारी योगदान को सदैव याद रखा जायेगा।

का. अहिल्या ताई अमर रहे।
का. अहिल्या ताई को लाल सलाम।

Sunday, April 12, 2009

श्रद्धांजलि: क्योंकि उनका नाम नईम था


नईम जी नहीं रहे। उनकी मृत्यु अप्रत्याशित नहीं थी अपितु प्रतीक्षित थी।
प्रसिद्ध युवा व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी जिन्होंने अपना व्यंग्य उपन्यास उन्हें ही समर्पित किया था व लिखा था 'पिता तुल्य नईमजी को सादर'। ज्ञान एक अच्छे साहित्यकार ही नहीं अच्छे डाक्टर भी हैं और ह्रदय रोग विशोषज्ञ हैं। मैंने जब नईमजी की बीमारी और उनके अस्पताल में भरती होने की खबर पढी तो सबसे पहला हाथ मेरा टेलीफोन पर ही गया तथा ज्ञान चतुर्वेदी को फोन लगा कर पूछा तो जैसा कि विशवास था उन्हें न केवल पूरी जानकारी ही थी अपितु उनकी पल पल की खबर वे रख रहे थे। उस समय भी ज्ञान का कहना था कि अब वे जिस दशा में हैं, उसमें उन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता है अगर अस्पताल से ठीक होकर वापिस भी आ गये तो भी जीवन निर्जीव सा ही रहेगा। ज्ञान अपने चिकित्सकीय पेशे में भावुक नहीं होते अपितु यथार्थ को बहुत साफ साफ कहते हैं। वे कम ही लोगों को सम्मान दते हैं पर नईमजी को पिता के समान सम्मान देते थे जिसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ। पर उस यथार्थ का वे भी क्या करते जो सामने था और उनकी मेडिकल साइंस में साफ दिख रहा था।
एक दूसरे कवि मित्र राम मेश्राम जो मध्यप्रदेश शासन से एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हो चुके हैं व अपने सहकर्मी- अधिकारियों के स्वभाव के विपरीत अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता, भावुकता और दूसरों की नि:स्वार्थ सहायता के लिए लगभग बदनाम हैं, को फोन लगाया तो पता चला कि खबर उन्हें भी पहले से ही है व संस्कृति सचिव से मिल कर उनकी सहायता के लिए आवेदन भिजवा चुके हैं व उन्हें उम्मीद है कि सहायता स्वीकृत भी हो जायेगी।
एक तीसरे व वरिष्ठ अधिकारी मित्र को फोन लगाकर सूचना दी और जानना चाहा कि यदि आजकल में उनका इंदौर का दौरा होने वाला हो तो मैं उनके साथ इंदौर तक की लिफ्ट लेकर नईमजी को देख आना चाहता हूँ। उनका उत्तर था कि वे परसों ही होकर आये हैं व उनकी दशा अच्छी नहीं कही जा सकती। ये कुछ उदाहरण हिन्दी के शिखरतम नवगीतकार नईमजी की लोकप्रियता और रिशतों के हैं। मैं स्वयं अपने को उनके निकट मानता था पर अगर सूची बनायी जाये तो यह कई हजार तक जा सकती है व इस पंक्ति में कौन कहाँ खड़ा होगा यह कहना बहुत कठिन है।
इस बीच में खबर आती है कि श्री राम मेश्राम के प्रयास सफल हुये हैं व शासन ने नईमजी की स्वास्थ सहायता के लिए एक लाख रूपये की राशि स्वीकृत कर दी है। इस खबर आने के अगले ही दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नईमजी को देखने जाने व वहीं उक्त राशि विधिवत घोषित होने की खबर आती है जिससे संतोष मिलता है कि प्रति दिन हजारों रूपयों में होने वाले खर्च से कुछ तो राहत मिलेगी। चारण किस्म के कुछ संस्थाबाज अपने आयोजनों में मुख्यमंत्री, संस्कृतिमंत्री और संस्कृति सचिव की जयजयकार करने लगते हैं।
पर यह संतोष का भाव ज्यादा दिन नहीं ठहरता क्योंकि आठ दस दिन बाद ही खबर आती है कि सहायता नहीं पहुँची और उसे आचार संहिता लगने तक विलंबित किया गया व बाद में आचारसंहिता का बहाना बना लिया गया। मध्यप्रदेश में इन दिनों जो सरकार है उससे ऐसी हरकत की ही उम्मीद की जा सकती थी। और हो भी क्यों न क्योंकि नईमजी जिस लेखन के लिए देश भर में जाने जाते थे वह किसी फासिस्ट सरकार को हजम होने वाली चीज नहीं है। उनके गीतों की कुछ पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जायेगा-
1
वो तो ये है कि अबोदाना है
बरना ये घर कसाई खाना है
आप झटका, हलाल के कायल
जान तो लोगो मेरी जाना है
2
काशी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
सौदा सुलफ कर लिया हो तो
उठ कर अपनी गठरी बांधो
इस बस्ती के बाशिंदे हम
लेकिन सब के सब अनिवासी
फिर चाहे राजे रानी हों
या फिर चाहे हों दासी
कै दिन की लकड़ी की हांड़ी
क्योंकर इसमें खिचड़ी रांधो

राजे बेईमान
बजीरा बे पेंदी के लोटे
छाये हुये चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गये हताहत
चलो कबीरा
ठगुये तस्कर साधो
काशाी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
3
प्यासे को पानी
भूखे को दो रोटी
मौला दे! दाता दे
आसमान की बात न जानूँ
जनगण भाग्य विधाता दे

धरती और आकाश न मांगूं
या ईशवरीय प्रकाश न मांगूं
मांगे हूँ दो गज जमीन बस
मैं शााही आवास न मांगूं
पावों को पनहीं
परधनियां मोंटी सोंटी
सिर को साफा छाता दे
4
चिटठी पत्री खतोकिताबत के मौसम कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
सही इबादत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है ये मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!

अब आप ही बताइये कि ऐसे गीत लिखने वाले नईम साहब को इलाज कराने के लिए वह सरकार क्यों आगे आयेगी जो अपना सारा ध्यान समाज को बांटने में लगाना चाहती है जिसने अरबों रूपयों की जमीन उन स्कूलों और संस्थाओं को दी है जो नफरत फैलाने के उद्योग चला रही हैं व जिसकी सारी राजनीति ही समाज को बांटने पर टिकी हुयी है। ढीलाढाला पापलीन का पाजामा कुर्ता पहिनने वाले नईम साहब किसी दुकान के बनिये से नजर आते थे भले ही वे कालेज के प्राचार्य रह चुके हों, उनके सारे ही गीत विशुद्ध हिंदी के गीत हों और जो अपने छूट गये बुन्देलखण्ड की याद को मालवा की धरती पर भी भुला न पाये हों। जिनको अपने सगे रिशतों से भी बढ कर सम्मान देने वालों में देश के वे बड़े से बड़े साहित्यकार हों जो जिनका जन्म गैर मुस्लिम परिवार में हुआ हो। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जिनके सगे साढू भाई हों और साम्प्रदायिक मुसलमान इसलिए तक नाराज हो जाते हों कि उनकी लड़की बिन्दी क्यों लगाती है। जो काष्ठशिल्प की मूर्तियां गढता हो तथा दुनिया भर के प्रगतीशील जनवादी उसे अपना बुजुर्ग मानते हों। और फिर उसका नाम भी नईम हो तो वो स्वाभाविक रूप से इस सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है। भले ही प्रचारक अधिकारी ने सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री से घोषणा करवा दी हो पर इस सरकार की असली चाबी तो कहीं और रहती है जब तक वहाँ से अनुमति नहीं मिल जाती तब तक क्या हो सकता है!
वैसे भी सरकारों की कही कितनी बातें सच होती हैं।

वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

Thursday, March 26, 2009

साईबर जगत में वामपंथी योद्धा

ब्लाग पर हिट्स की तुलना वोट से कर पी.एम. इन वेटिंग आडवाणी महोदय अब इंटरनेट पर आक्रामक प्रचार के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का ख्वाब संजो रहे है। lkadvani.in पर अब तक करोडो रूपये खर्च कर चुके आडवाणी व उनकी टीम ने पाच बरस पूर्व शाईनिंग इंडिया की थिम पर चुनाव लड मुह की खाने के बाद भी सीख नही ली। । खैर, काडर व समर्पित कार्यकर्ताका भरोसा न करने वाली फासीवादी-पूंजीवादी पार्टी से कुछ र उम्मीद भी नही की जा सकती है।

साईबर जाला (इंटरनेट) नि:संदेह ही आज संचार का एक प्रमुख साधन बन चुका है। भले ही इंटरनेट की पहुच एक विशेष तबके तक सिमित है लेकिन फिर भी इसके महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, आज के युवा वर्ग में इंटरनेट की अच्छी-खासी लोकप्रियता है। आगामी चुनावों में युवा वर्ग तक अपनी बात बिना किसी पक्षपात के पहुचाने के लिये माकपा पोलित ब्यूरों सदस्य कामरेड सीताराम येचूरी ने 18 मार्च को आधिकारीक चुनावी वेबसाईट http://vote.cpim.org का उद्घाटन किया। इस वेबसाईट के अलावा voteleft2009 आरकुट समूह, voteleft2009 ब्लाग व अनाधिकारीक चुनावी वेब voteleft2009.org भी सफलतापूर्वक वामपंथ के पक्ष को युवाओ तक पहुचा रहे है। दो तथ्य ऐसे है जो माकपा की तमाम वेबसाईटो को अन्य दलो की चुनावी वेबसाईटो से अलहदा बनाते है – अव्वल ये कि ये दोनो ही वेबसाईटे पूर्णत: मुक्त स्त्रोतो के द्वारा बनायी गयी है एवं दूसरा ये साईटे सहकार पर आधारित डेवलपमेंट का बहुत ही सुंदर उदाहरण है। vote.cpim.org को विकसीत करने में मुक्त अथवा फ्री साफ्टवेयर (PHP – Drupal CMS) की मदत ली गयी है। माकपा शुरू से ही भारत में मुक्त साफ्टवेयरों के विकास व प्रसार की प्रबल पक्षधर रही है, यही नहीं माकपा हिन्दूस्तान में एकमात्र राजनितीक दल है जिसका अपना मुक्त साफ्टवेयर सेल भी है। vote.cpim.org को माकपा के शुभचिंतको व समर्थको ने विकसीत किया वही voteleft2009 तीन वामपंथ समर्थक मित्रो द्वारा बनाया आरकुट समूह था जो आगे चलकर ब्लाग तथा उसके बाद एक संपूर्ण चुनावी वेब में बदल गया।

दोनो ही वेबसाईटो पर प्रमुख वामपंथी नेताओ के भाषण सुने व देखे जा सकते है, किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू की जा सकती है, चुनाव से जुडी खबरे पढी जा सकती है, चुनावी मैदान से ताजा तस्वीरे देखी जा सकती है। माकपा के समर्थन में साईबर दुनिया में उतरी दोनो ही वेबसाईटो ने सही मायने में एक आदर्श स्थापित किया है।

Tuesday, March 17, 2009

वामपंथी पार्टीयों ने हमेंशा सिद्धांतो की राजनीति की

9 एवं 10 मार्च को इन्दौर से निकलने वाले दैनिक नईदुनिया की संपादकीय टिप्प्णीयो में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर सिद्धांतहिन गठजोड करने संबंधित अनेक अन्रगल आरोप लगाकर बदनाम करने की कोशिश की गई। जबसे का. प्रकाश करात की भाजपा-काग्रेस रहित वैकल्पिक मोर्चा बनाने की कोशिशे रंग लाने लगी हैं, कारपोरेट नियंत्रित तमाम मिडिया इस वैकल्पिक मोर्चे के घटक दलो खासकर इसके अगुआ माकपा के खिलाफ सुनियोजित तरीके से जहर उगल रहा है। मिडिया ने इस ‘वैकल्पिक मोर्चे’ को सिद्धांतहीन घोषित करने में कोई कसर बाकी नही छोडी है, जबकि हकीकत यह है कि माकपा ने सत्ता नहीं सदैव सिद्धांतो की राजनीति की है वही बंगाल, त्रिपुरा व केरल की गठबंधन सरकारें अन्य देशो के लिये रोल-माडल का काम कर रही है।

अव्वल तो यह है कि वामपंथी दल पश्चिम बंगाल, केरल व त्रिपुरा में अगर सत्ता में है तो आम जनता का विश्वास अर्जित कर, न कि मतदाता सूचियों की हेराफेरी या आपराधिक आतंकी तरीकों से। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद से पिछले 32 वर्षो से वामपंथी लगातार 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त कर चुनावो में जितते आये है, इसका मूल आधार यह है कि केरल, त्रिपुरा के साथ ही पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आते ही वामपंथी सरकारों ने मूलगामी भूमिसुधार कार्यक्रम को लागु करते हुवे 18 लाख हेक्टियर जमीन भूमिहीनों में वितरित की, परिणामस्वरूप ग्रामीणों गरीबों की क्रयशक्ति में इजाफा हुआ और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा है। इसिलिये वहां की जनता बारंबार वामपंथीयों को सत्ता में लाती रही है। लेकिन क्या कांग्रेस व भाजपा शासित राज्य सरकारों ने ईमानदारी से भूमिसुधारों को लागु करके दिखाया है?

वामपंथी दलों ने साढे चार बरस तक कांग्रेस के नेतृत्व वाले यू.पी.ए. गठबंधन को समर्थन दिया, मकसद यही था कि सांप्रदायिक ताकतों के हमले से देश की एकता व अखंडता की रक्षा की जाए और धार्मिक अल्पसंख्यकों की हिफाजत की जाए। वामपंथ ने एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर यू.पी.ए. सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला लिया था। वामपंथीयों के दबाव में ही अनिच्छुक कांग्रेस को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार ग्यारंटी कानून, आदिवासी वनअधिकार कानून, सूचना का अधिकार जैसे कुछ वादे निभाने पडे थे। दुसरी तरफ वामपंथ के दबाव में ऐसे अनेकों नव-उदारवादी कदमों को रोका जा सका, जिन्हें कांग्रेस पार्टी संसद में कानून बनाकर देश पर थोपना चाहती थी। सचाई यह है कि इन कदमों के रोके जाने से मौजूदा वैश्विक आर्थिक मंदी के हालात में भारत कहीं बेहतर स्थिति में है वरना उसे ओर भारी तबाही का सामना करना पडता। कांग्रेस चाहती थी कि रूपये को पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया जाये, विदेशी बैंकों को भारतीय निजी बैंकों के अधिग्रहण का मौका दिया जाये, पेंशन फंड का निजीकरण कर दिया जाये तथा बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में बढोतरी कर दी जाए। इन कदमों को अगर लागु कर दिया होता तो वैश्विक आर्थिक संकट के साथ हमारे देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद होती साथ ही करोड़ों भारतीय तबाह होते अलग। जब यू.पी.ए. सरकार ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का सरासर उल्लंघन करते हुए जार्ज बुश के नेतृत्व वाली अमरीकी सांम्राज्यवाद के साथ रणनीतिक गठजोड कायम किया, जो न तो भारत के हित में है न ही भारत की जनता के हित में, ऐसी स्थिती में यू.पी.ए. से समर्थन वापस लेना ही एकमात्र रास्ता वामपंथ के पास रह गया था।

पूंजीपती व सामंत वर्ग के दो बड़े दल कांग्रेस व भाजपा 1991 के बाद से जिस उदारीकरण व निजीकरण की आर्थिक नितियों को अपनाती आयी है, उसने देश की आम जनता की समस्या व दरिद्रता में इजाफा किया है, फलत: कांग्रेस व भाजपा दोनों ही आम जनता से अलग होते जा रहे है। पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजों की गहराई से पडताल करने पर हम पाते है कि गैर कांग्रेस तथा गैर भाजपायी पार्टीयों के हिस्से में काफी वोट आये है।
हालाकी मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई है लेकिन उसे कुल वोट का 37.8 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ है जबकि कांग्रेस से अलग अन्य दलो के हिस्से में 21.6 प्रतिशत वोट आये है। इसी तरह राजस्थान में जहां कांग्रेस ने 36.8 प्रतिशत वोट हासिल कर सरकार बनाई है वही भाजपा से अलग अन्य दलो के हिस्से में 29 प्रतिशत वोट पडे है। दिल्ली में जहां कांग्रेस ने 40.5 प्रतिशत वोट हासिल कर पुन: सरकार बनायी है वहा भाजपा से अलग पार्टीयों के हिस्से में 23 प्रतिशत वोट आये है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में 40.6 प्रतिशत वोट लेकर भाजपा ने सरकार तो बना ली लेकिन कांग्रेस से अलग दलों के हिस्से में 20.6 प्रतिशत वोट आये है।

उपरोक्त आकडों का राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। जहां तक आम जनता के जीवन तथा आजीवीका से जुडे मुद्दों का सवाल है कांग्रेस व भाजपा द्वारा अपनायी जा रही नितियों में कोई अंतर नजर नहीं आता है। कांग्रेस की स्थिति उत्तरप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में नगण्य है तो भाजपा उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल में। साफ है कि जनता वैकल्पिक आर्थिक नितियों पर आधारित ‘वैकल्पिक मोर्चे’ की ओर देख रहीं है। वैकल्पिक नितियों पर आधारित ‘वैकल्पिक मोर्चा’ अस्तित्व में आ रहा है और यही भविष्य में स्थायी गठबंधन होगा।

कैलाश लिम्बोदिया
सचिव
माकपा जिला संगठन समिति, इन्दौर
(9425345219)
What CPI(M) says?