Tuesday, March 17, 2009

वामपंथी पार्टीयों ने हमेंशा सिद्धांतो की राजनीति की

9 एवं 10 मार्च को इन्दौर से निकलने वाले दैनिक नईदुनिया की संपादकीय टिप्प्णीयो में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर सिद्धांतहिन गठजोड करने संबंधित अनेक अन्रगल आरोप लगाकर बदनाम करने की कोशिश की गई। जबसे का. प्रकाश करात की भाजपा-काग्रेस रहित वैकल्पिक मोर्चा बनाने की कोशिशे रंग लाने लगी हैं, कारपोरेट नियंत्रित तमाम मिडिया इस वैकल्पिक मोर्चे के घटक दलो खासकर इसके अगुआ माकपा के खिलाफ सुनियोजित तरीके से जहर उगल रहा है। मिडिया ने इस ‘वैकल्पिक मोर्चे’ को सिद्धांतहीन घोषित करने में कोई कसर बाकी नही छोडी है, जबकि हकीकत यह है कि माकपा ने सत्ता नहीं सदैव सिद्धांतो की राजनीति की है वही बंगाल, त्रिपुरा व केरल की गठबंधन सरकारें अन्य देशो के लिये रोल-माडल का काम कर रही है।

अव्वल तो यह है कि वामपंथी दल पश्चिम बंगाल, केरल व त्रिपुरा में अगर सत्ता में है तो आम जनता का विश्वास अर्जित कर, न कि मतदाता सूचियों की हेराफेरी या आपराधिक आतंकी तरीकों से। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद से पिछले 32 वर्षो से वामपंथी लगातार 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त कर चुनावो में जितते आये है, इसका मूल आधार यह है कि केरल, त्रिपुरा के साथ ही पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आते ही वामपंथी सरकारों ने मूलगामी भूमिसुधार कार्यक्रम को लागु करते हुवे 18 लाख हेक्टियर जमीन भूमिहीनों में वितरित की, परिणामस्वरूप ग्रामीणों गरीबों की क्रयशक्ति में इजाफा हुआ और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा है। इसिलिये वहां की जनता बारंबार वामपंथीयों को सत्ता में लाती रही है। लेकिन क्या कांग्रेस व भाजपा शासित राज्य सरकारों ने ईमानदारी से भूमिसुधारों को लागु करके दिखाया है?

वामपंथी दलों ने साढे चार बरस तक कांग्रेस के नेतृत्व वाले यू.पी.ए. गठबंधन को समर्थन दिया, मकसद यही था कि सांप्रदायिक ताकतों के हमले से देश की एकता व अखंडता की रक्षा की जाए और धार्मिक अल्पसंख्यकों की हिफाजत की जाए। वामपंथ ने एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर यू.पी.ए. सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला लिया था। वामपंथीयों के दबाव में ही अनिच्छुक कांग्रेस को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार ग्यारंटी कानून, आदिवासी वनअधिकार कानून, सूचना का अधिकार जैसे कुछ वादे निभाने पडे थे। दुसरी तरफ वामपंथ के दबाव में ऐसे अनेकों नव-उदारवादी कदमों को रोका जा सका, जिन्हें कांग्रेस पार्टी संसद में कानून बनाकर देश पर थोपना चाहती थी। सचाई यह है कि इन कदमों के रोके जाने से मौजूदा वैश्विक आर्थिक मंदी के हालात में भारत कहीं बेहतर स्थिति में है वरना उसे ओर भारी तबाही का सामना करना पडता। कांग्रेस चाहती थी कि रूपये को पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया जाये, विदेशी बैंकों को भारतीय निजी बैंकों के अधिग्रहण का मौका दिया जाये, पेंशन फंड का निजीकरण कर दिया जाये तथा बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में बढोतरी कर दी जाए। इन कदमों को अगर लागु कर दिया होता तो वैश्विक आर्थिक संकट के साथ हमारे देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद होती साथ ही करोड़ों भारतीय तबाह होते अलग। जब यू.पी.ए. सरकार ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का सरासर उल्लंघन करते हुए जार्ज बुश के नेतृत्व वाली अमरीकी सांम्राज्यवाद के साथ रणनीतिक गठजोड कायम किया, जो न तो भारत के हित में है न ही भारत की जनता के हित में, ऐसी स्थिती में यू.पी.ए. से समर्थन वापस लेना ही एकमात्र रास्ता वामपंथ के पास रह गया था।

पूंजीपती व सामंत वर्ग के दो बड़े दल कांग्रेस व भाजपा 1991 के बाद से जिस उदारीकरण व निजीकरण की आर्थिक नितियों को अपनाती आयी है, उसने देश की आम जनता की समस्या व दरिद्रता में इजाफा किया है, फलत: कांग्रेस व भाजपा दोनों ही आम जनता से अलग होते जा रहे है। पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजों की गहराई से पडताल करने पर हम पाते है कि गैर कांग्रेस तथा गैर भाजपायी पार्टीयों के हिस्से में काफी वोट आये है।
हालाकी मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई है लेकिन उसे कुल वोट का 37.8 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ है जबकि कांग्रेस से अलग अन्य दलो के हिस्से में 21.6 प्रतिशत वोट आये है। इसी तरह राजस्थान में जहां कांग्रेस ने 36.8 प्रतिशत वोट हासिल कर सरकार बनाई है वही भाजपा से अलग अन्य दलो के हिस्से में 29 प्रतिशत वोट पडे है। दिल्ली में जहां कांग्रेस ने 40.5 प्रतिशत वोट हासिल कर पुन: सरकार बनायी है वहा भाजपा से अलग पार्टीयों के हिस्से में 23 प्रतिशत वोट आये है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में 40.6 प्रतिशत वोट लेकर भाजपा ने सरकार तो बना ली लेकिन कांग्रेस से अलग दलों के हिस्से में 20.6 प्रतिशत वोट आये है।

उपरोक्त आकडों का राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। जहां तक आम जनता के जीवन तथा आजीवीका से जुडे मुद्दों का सवाल है कांग्रेस व भाजपा द्वारा अपनायी जा रही नितियों में कोई अंतर नजर नहीं आता है। कांग्रेस की स्थिति उत्तरप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में नगण्य है तो भाजपा उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल में। साफ है कि जनता वैकल्पिक आर्थिक नितियों पर आधारित ‘वैकल्पिक मोर्चे’ की ओर देख रहीं है। वैकल्पिक नितियों पर आधारित ‘वैकल्पिक मोर्चा’ अस्तित्व में आ रहा है और यही भविष्य में स्थायी गठबंधन होगा।

कैलाश लिम्बोदिया
सचिव
माकपा जिला संगठन समिति, इन्दौर
(9425345219)

3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

हिंदी ब्लॉगजगत में शुभकामनाओं के साथ स्वागत है।

चूंकि आप कह रहे हैं कि 'बंगाल, त्रिपुरा व केरल की गठबंधन सरकारें अन्य देशो के लिये रोल-माडल का काम कर रही है।'

तो आपसे भी एक ही सवाल पूछना चाहूंगा जो छत्तीसगढ़ में संजय पराते जी से भी अक्सर पूछता हूं कि क्या नंदीग्राम के नरसंहार को एक रोल मॉडल माना जाए अन्य राज्यों के लिए?

परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

धन्यवाद रचना जी, संजीत त्रिपाठी जी।
नंदीग्राम में माकपा पर नरसंहार का आरोप लगाया जा रहा है जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। ये फार राईटिस्ट से फार लेफ्टिस्ट का गठजोड था जिसने हजारों माकपा कार्यकर्ताआे को अपने घरबार छोड शरणार्थी शिविरों में रहने पर मजबुर किया। इस बारे में अन्य हमारे फोरमो पर पुर्ण जानकारी कई बार दि जा चुकी है। परंतु माकपा को निपटाने के चक्कर में राष्ट्रीय मिडिया में दुसरे पक्ष अर्थात माकपा की बात सामने आने नहीं दि जा रही है।
नंदिग्राम के संबंध में लोकजतन प्रकाशन मध्यप्रदेश ने "शांति की आेर वापस लौटता नंदीग्राम" शिर्षक से एक छोटी पुस्तिका निकाली है जिसमें आपके तमाम सवाल का जवाब दिया गया है, कृपाय करके पुस्तिका मंगाकर पढने का कष्ट करे।
बहरहाल, हम विषय से भटक रहे है, उपरोक्त लेख हिन्दोस्तां में गैर भाजपा गैर कांग्रेसी वैकल्पिक मोर्चे की प्रासंगिकता को लेकर था, अगर बहस इस विषय पर कैंद्रित रहे तो उचित होगा।

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...
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What CPI(M) says?